धर्म - एक रोग ?
रा -ष्टों के बाद दूसरा बड़ा रोग है धर्म । क्योंकि वे लड़ते ही रहे हैं , मार - काट ही करते रहे हैं , और ऐसे कारणों के लिए जिनमें किसी को रस नहीं है । ईसाइयत पहला धर्म था जिसने लोगों के मन में यह खयाल पैदा कर दिया कि युद्ध भी धार्मिक हो सकता है । और इस्लाम और अन्य धर्मों ने उसका अनुसरण किया और वे परमात्मा के नाम पर एक - दूसरे का कत्ल करते रहे ।
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| Source - newindianexpress.com |
मैं कहता हूं , युद्ध मात्र अधार्मिक है । धर्मयुद्ध , जिहाद या पवित्र युद्ध जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती । अगर तुम युद्ध को पवित्र कहते हो तो फिर अपवित्र कहने के लिए क्या बचता है ? परमात्मा में किसे रस है , सिवाय पुरोहितों के ? मेरा कभी ऐसे आदमी से मिलना नहीं हुआ जो सचमुच परमात्मा में उत्सुक हो ।
अगर तुम एक हाथ में पांच रुपये का नोट रखो और दूसरे हाथ में परमात्मा , तो वह पांच रुपये का नोट उठा लेगा और कहेगा , “ परमात्मा तो शाश्वत है ; देखेंगे , फिर कभी । अभी तो पांच रुपये ज्यादा काम के होंगे । " लेकिन पुरोहितों की उत्सुकता इसलिए है क्योंकि परमात्मा उनका धंधा है , और वे चाहते हैं कि उनका धंधा खूब चले ।
धर्मों ने मनुष्य की अखंडता को नष्ट कर दिया है , उन्होंने उसको तोड़ दिया है — न केवल खंडों में बल्कि विपरीत खंडों में ; और ये खंड निरंतर आपस में लड़ते रहते हैं । इसी भांति उन्होंने मानवता को खंडित , स्किज़ोफ्रेनिक कर दिया है । उन्होंने हर व्यक्ति को एक खंडित व्यक्तित्व दे दिया है ।
यह बड़ी हुशियारी और चालाकी से किया गया है - तुम्हारे शरीर की , तुम्हारे सेक्स की निंदा करके , तुम्हें अपने ही स्वभाव के खिलाफ भड़काकर । सारे धर्म उन सब चीजों के खिलाफ हैं जिनका मनुष्य मज़ा ले सकता है । मनुष्य को दुखी रखने में , शांति , आनंद और तृप्ति को खोज लेने - अभी और यहीं स्वर्ग की प्राप्ति की हर संभावना को नष्ट करने में उनका न्यस्त स्वार्थ है ।
तुम्हारा दुख नितांत आवश्यक है ताकि परलोक बना रहे । उदाहरण के लिए अगर तुम्हारा सेक्स सचमुच तृप्त हो गया तो तुम्हें परमात्मा की जरूरत नहीं होती क्योंकि तुम्हारा जीवन कृतकृत्य हो जाता है ।
लेकिन अगर तुम्हारे सेक्स की निंदा की जाए , उसका दमन किया जाए , उसे नष्ट किया जाए , अगर तुम्हारे मन में उसके प्रति निंदा का भाव पैदा किया जाए तो फिर परमात्मा सदा जीता । इस खोज से बचने के लिए तुम सरलता से किसी की बातों में आ जाते हो , तुम सरलता से उसके शिकार हो जाते हो जो तुम्हारा शोषण करने को तैयार हो । और स्वभावतः भीड़ आरामदेह लगती है । साठ करोड़ कैथोलिक हैं - आरामदेह लगता है । और ऐसा लगता है , साठ करोड़ लोग गलत नहीं हो सकते । तुम गलत हो सकते हो लेकिन साठ करोड़ लोग गलत नहीं हो सकते । लेकिन उनमें से प्रत्येक व्यक्ति ठीक ऐसा ही सोच रहा है ।
चालीस करोड़ हिंदू सोचते हैं , वे सही हैं । और यही मुसलमानों , बौद्धों और अन्य धर्मों के संबंध में सच है । धर्म एक मुर्दा संगठन न हो बल्कि एक तरह की धार्मिकता , एक प्रेमपूर्ण हृदय , समग्र के प्रति एक मैत्रीभाव हो । इसके लिए किन्हीं पवित्र धर्मग्रंथों की जरूरत नहीं है । एक प्रामाणिक धार्मिकता को न पैगंबरों की जरूरत है , न उद्धारकों की , न गिरजाघरों की , न पोपों की , न पुरोहितों की । क्योंकि धार्मिकता तुम्हारे खिले हुए हृदय का नाम है । यदि पूरी दुनिया में धार्मिकता का प्रसार हो तो धर्म विदा हो जाएंगे ।
जब मनुष्य सिर्फ मनुष्य होगा तो वह मानवता के लिए परम वरदान सिद्ध होगा - न वह ईसाई होगा , न मुसलमान , न हिंदू । धार्मिकता एक व्यक्तिगत मामला है । यह तुम्हारी तरफ से समूचे ब्रह्मांड को दिया गया प्रेम संदेश है । तभी वह शांति पैदा होगी जो सारी नासमझी के पार है । अन्यथा ये धर्म परजीवी रहे हैं ये लोगों का शोषण करते रहे हैं , उन्हें गुलाम बनाते रहे हैं , उन्हें जबरदस्ती विश्वास पकड़ाते रहे हैं । और सभी विश्वास बुद्धिमत्ता के खिलाफ हैं । मैं चाहूंगा कि पूरा संसार धार्मिक हो जाए ; जीवन प्रत्येक व्यक्ति की निज स्वतंत्रता से निकली हुई स्वतंत्र खोज बन जाए । तो प्रथमतः , अगर इस संसार को बचाना है तो राष्ट्र विदा होने चाहिए ।
भारत और इंग्लैंड और जर्मनी - इनकी कोई जरूरत नहीं है । दूसरी बात , धर्म विदा हों । एक मनुष्यता पर्याप्त है । और एक धार्मिकता काफी है । ध्यान , सत्य , प्रेम , प्रामाणिकता , ईमानदारी - इनके ऊपर हिंदू , ईसाई , मुसलमान ये लेबिल लगाने की कोई जरूरत नहीं है । केवल धार्मिकता हो - एक गुणवत्ता , कुछ संगठित नहीं ।
जैसे ही संगठन आता है , हिंसा होने ही वाली है क्योंकि अन्य संगठनों से संघर्ष पैदा होगा । हमें एक व्यक्तियों का जगत चाहिए जिसमें कोई संगठन न हों ( हां , ऐसे लोगों के सम्मेलन हो सकते हैं जिनके समान भाव हों , समान खुशियां हों , हर्षोल्लास हों लेकिन कोई संगठन , पदानुक्रम या नौकरशाही न हो ।
पहले राष्ट्र , फिर धर्म ; और तीसरे , बेहतर जीवन को , अधिक जीवन को , श्रेष्ठतर बुद्धिमत्ता को , अधिक सृजनात्मकता को समर्पित विज्ञान - अधिक लड़ाइयां लड़ने के लिए नहीं , विनाश के लिए नहीं । यदि ये तीन बातें संभव हो सकें तो पूरी मानवता को उसके अपने ही धार्मिक , राजनैतिक , सामाजिक नेताओं के हाथों विनष्ट होने से बचाया जा सकता है ।
एक प्रामाणिक धार्मिकता को न पैगंबरों की जरूरत है , न उद्धारकों की , न गिरजाघरों की , न पोपों की , न पुरोहितों की । क्योंकि धार्मिकता तुम्हारे खिले हुए हृदय का नाम है ।
Source - एक महान चुनौती (मनुष्य का स्वर्णिरम भविष्य)
Reviewed by Life 38 %
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